
संपादकीय: जंतर-मंतर पर सवर्ण आंदोलन – योग्यता, सामाजिक न्याय और नए युग की आकांक्षाओं का द्वंद्व
बलराम पांडेय (समूह संपादक विन्ध्यभूमि)
दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर देश की सामाजिक और राजनीतिक सरगर्मियों का केंद्र बन गया है। इस बार अवसर किसी राजनीतिक दल के पारंपरिक शक्ति प्रदर्शन का नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से लामबंद हुए सामान्य वर्ग (सवर्ण समाज) के युवाओं के ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ का है। जातिगत आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव, आर्थिक आधार पर सहायता, और हालिया यूजीसी नियमों के विरोध को लेकर हजारों युवाओं की यह अप्रत्याशित भीड़ कई गंभीर सवाल खड़े करती है। इस प्रदर्शन को किसी बड़े राजनेता ने नहीं, बल्कि डिजिटल मंचों ने गति दी है, जिसने नीति-निर्माताओं और समाजशास्त्रियों को इस नए उभार का गहराई से विश्लेषण करने पर मजबूर कर दिया है।इस पूरे घटनाक्रम पर देश के प्रतिष्ठित समाजशास्त्रियों और लेखकों की राय बहुआयामी और अत्यंत गंभीर है।
प्रख्यात विचारकों का मानना है कि जंतर-मंतर पर उमड़ा यह जनसैलाब केवल एक तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह सामान्य वर्ग के युवाओं के भीतर लंबे समय से पनप रहे उस असंतोष का प्रकटीकरण है, जो वे नौकरियों की कमी और गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में महसूस कर रहे हैं। कई समकालीन लेखकों का तर्क है कि वैश्वीकरण और निजीकरण के बावजूद, आज भी एक सुरक्षित भविष्य के लिए सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों पर युवाओं की निर्भरता बहुत अधिक है। ऐसे में जब सामान्य श्रेणी की सीटें लगातार सिमटती दिखती हैं, तो युवाओं का यह वर्ग खुद को व्यवस्था में उपेक्षित और ‘हाशिए पर धकेला हुआ’ महसूस करने लगता है।
वरिष्ठ स्तंभकारों और बुद्धिजीवियों का एक धड़ा इस आंदोलन के मुख्य तर्कों—जैसे आर्थिक आधार पर आरक्षण, ‘एक परिवार, एक आरक्षण’ की नीति और क्रीमी लेयर का सख्ती से पालन—को एक तर्कसंगत विमर्श के रूप में देखता है। लेखकों की राय है कि स्वतंत्रता के आठ दशकों बाद इस बात की समीक्षा अवश्य होनी चाहिए कि सामाजिक न्याय के लाभ क्या वास्तव में उन वंचितों तक पहुंच पा रहे हैं जो कतार के अंतिम पायदान पर खड़े हैं, या फिर इसका लाभ एक ही वर्ग की समृद्ध पीढ़ियां उठा रही हैं। बौद्धिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि जब तक आरक्षण की नीतियों में समय-बद्ध सुधार या ‘सनसेट क्लॉज’ जैसी व्यवस्थाओं पर खुलकर बात नहीं होगी, तब तक सामाजिक समरसता को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा।इसके विपरीत, सामाजिक न्याय के पैरोकारों और दलित-पिछड़े विमर्श के लेखकों की राय इस आंदोलन को लेकर एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। उनका दृढ़ता से मानना है कि भारत में आरक्षण कभी भी कोई ‘गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम’ नहीं था, बल्कि यह सदियों से सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से प्रताड़ित और वंचित रहे समुदायों को प्रतिनिधित्व और सम्मान सुनिश्चित करने का एक संवैधानिक साधन है।
इन विचारकों का कहना है कि प्रशासनिक सेवाओं, उच्च शिक्षा और नीति-निर्धारण के शीर्ष पदों पर आज भी वंचित समाजों की हिस्सेदारी उनकी आबादी के अनुपात में बेहद कम है। इसलिए, जातिगत आधार को पूरी तरह खारिज करके केवल आर्थिक आधार को पैमाना बनाना ऐतिहासिक रूप से शोषित वर्गों के साथ अन्याय होगा।संपादकीय दृष्टिकोण से देखें तो यह आंदोलन भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और उसकी आंतरिक जटिलताओं दोनों को दर्शाता है। एक तरफ जहां युवाओं का अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण तरीके से लोकतांत्रिक स्थान पर जुटना उनका अधिकार है, वहीं दूसरी तरफ कानून और व्यवस्था को बनाए रखना भी उतना ही अनिवार्य है। प्रशासन द्वारा प्रदर्शन की अनुमति न होने का हवाला देकर की गई कार्रवाई और युवाओं का डटे रहना, राज्य और नागरिक के बीच के संवाद की कमी को रेखांकित करता है।लेखकों और विश्लेषकों का यह साझा निष्कर्ष है कि इस जटिल सामाजिक पहेली का समाधान सड़कों पर टकराव से या इंटरनेट पर केवल नारेबाज़ी से नहीं निकाला जा सकता।
इसके लिए एक गंभीर, व्यापक और निष्पक्ष राष्ट्रीय संवाद की आवश्यकता है। सरकार को जहां एक ओर ऐतिहासिक सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धताओं की रक्षा करनी होगी, वहीं दूसरी ओर सामान्य वर्ग के गरीब और योग्य युवाओं की वास्तविक चिंताओं और उनके प्रशासनिक दर्द को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।अंततः, जंतर-मंतर की ये आवाजें इस बात का संकेत हैं कि देश का युवा वर्ग अब नीतियों के पुनर्मूल्यांकन की मांग कर रहा है। चुनौती यह है कि हम एक ऐसा संतुलित तंत्र कैसे विकसित करें जो योग्यता (मेरिट) का सम्मान भी करे, देश के आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को संबल भी दे और सदियों से सामाजिक असमानता झेल रहे वंचित समाज के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित करे। यही हमारे लोकतंत्र की असली परीक्षा होगी।





























