दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पूछा— मरीजों की मजबूरी का फायदा क्यों उठा रही व्यवस्था?
एमआरपी और खरीद मूल्य में 300 से 400 प्रतिशत तक का अंतर, कैंसर के इंजेक्शन की कीमत पर भी उठे सवाल

दिल्ली। दवाओं की आसमान छूती कीमतों और मरीजों से वसूले जा रहे भारी शुल्क को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मंगलवार, 27 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने पूछा कि दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) और उनके खरीद मूल्य के बीच भारी अंतर को सरकार किस आधार पर उचित ठहरा सकती है। अदालत ने यह भी सवाल किया कि क्या दवा निर्माताओं और विक्रेताओं को मनमाने ढंग से कीमतें तय करने की छूट दी जानी चाहिए।
पीठ ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पूरी व्यवस्था दवा निर्माताओं के हितों की रक्षा कर रही है, जबकि मरीजों को महंगी दवाएं खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। अदालत ने कहा कि मरीजों के पास कीमतों पर मोलभाव करने का विकल्प नहीं होता और उनकी जिंदगी के सवाल को केवल व्यापारिक नीति के नजरिये से नहीं देखा जा सकता।
11 हजार का इंजेक्शन अस्पताल में 1.30 लाख रुपये का!
सुनवाई के दौरान पीठ ने एक मामले का उल्लेख किया, जिसमें कैंसर के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाला एक इंजेक्शन दवा वितरक को लगभग 11 हजार रुपये में उपलब्ध था, जबकि अस्पताल में उसके लिए 1.30 लाख रुपये वसूले गए। इस भारी अंतर पर चिंता जताते हुए अदालत ने सवाल किया कि कीमतों में इतना बड़ा अंतर आखिर क्यों है और अतिरिक्त पैसा कहां जा रहा है।
पीठ ने यह भी कहा कि दवाओं की कीमतों में 300 से 400 प्रतिशत या उससे अधिक का अंतर होने पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। अदालत के अनुसार, मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाने वाली व्यवस्था को केवल बाजार में प्रतिस्पर्धा होने के तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता।
एनपीपीए की भूमिका पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। इस संस्था का उद्देश्य दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करना और उन्हें आम लोगों के लिए किफायती बनाए रखना है। केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि भारत में दवा बाजार प्रतिस्पर्धी है और यहां कई दवाएं दुनिया के अन्य देशों की तुलना में कम कीमत पर उपलब्ध हैं। हालांकि, पीठ ने कहा कि मरीजों के हितों को व्यापार और आर्थिक नीति के मुकाबले कमतर नहीं आंका जा सकता।
कैंसर की दवाओं पर 30 प्रतिशत मार्जिन का मुद्दा
सुनवाई में केंद्र सरकार के उस फैसले पर भी सवाल उठे, जिसके तहत कैंसर रोधी दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य के 30 प्रतिशत तक सीमित करने का कदम उठाया गया है। पीठ ने पूछा कि इस दिशा में कदम उठाने में इतना समय क्यों लगा और अन्य दवाओं के मामले में भी व्यापारिक मार्जिन की सीमा तय करने पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता।
सरकार ने पहले दावा किया था कि कैंसर रोधी दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन सीमित करने से मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। इससे पहले अदालत ने सलाइन ड्रिप की कीमत और उसकी वास्तविक लागत के बीच बड़े अंतर का मुद्दा भी उठाया था।
सस्ती दवाओं की मांग को लेकर याचिकाएं
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में आवश्यक दवाओं की कीमतों में कथित अनुचित बढ़ोतरी रोकने, औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 को प्रभावी ढंग से लागू करने और दवाओं की बिक्री व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की गई है। एक अन्य याचिका में मरीजों को जेनेरिक दवाएं नहीं लिखने वाले चिकित्सा पेशेवरों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी उठाई गई है।
इस मामले में अदालत की टिप्पणियों ने दवा मूल्य निर्धारण, अस्पतालों में दवाओं की बिक्री और मरीजों को किफायती इलाज उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर बहस तेज कर दी है। हालांकि, सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों को अंतिम न्यायिक आदेश या सभी दवाओं पर लागू नए मूल्य नियम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।















































