अन्तर्राष्ट्रीयफ़्लैश न्यूज़राजनीतिसंपादकीय

मोदी सरकार की शिक्षा व्यवस्था पर मुरली मनोहर जोशी के तीखे सवाल, बोले- ‘घोटाले होंगे तो छात्रों को कैसे दोष दें’

IMG 20260828 WA0088

विंध्यभूमि:भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था, सरकारी नीतियों और शिक्षा क्षेत्र की प्राथमिकताओं को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। एक विस्तृत साक्षात्कार में उन्होंने शिक्षा बजट में कमी, सरकारी विद्यालयों की स्थिति, शिक्षकों की कमी, निजीकरण, बेरोजगारी, पेपर लीक और शिक्षा संस्थानों में बढ़ते दबाव जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी।

 

हिंदी दैनिक ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री के साथ बातचीत में जोशी ने केंद्र सरकार की शिक्षा संबंधी नीतियों की दिशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश में शिक्षा को रोजगार और सामाजिक विकास से जोड़कर देखने की जरूरत है।

 

उल्लेखनीय है कि नरेंद्र मोदी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे मुरली मनोहर जोशी को पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में शामिल किया गया था। इसके बाद वह सक्रिय राजनीति में पहले की तरह नजर नहीं आए।

 

पेपर लीक पर बोले- व्यवस्था ने खुद रास्ता तैयार किया

 

शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आ रही पेपर लीक की घटनाओं के सवाल पर जोशी ने इसे केवल परीक्षा प्रणाली की समस्या मानने से इनकार किया। उनका कहना था कि इसकी जड़ समाज और शासन व्यवस्था में दिखाई देने वाले व्यापक भ्रष्टाचार से भी जुड़ी है।

 

उन्होंने कहा कि सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि देश की शिक्षा व्यवस्था को किस दिशा में ले जाना है। उनके अनुसार शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे व्यक्ति को ज्ञान के साथ-साथ आजीविका का अवसर भी मिले।

 

जोशी ने उच्च डिग्रियां हासिल करने के बावजूद युवाओं को सामान्य या कम वेतन वाली नौकरियों में काम करते देखने पर चिंता जताई। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार उच्च शिक्षित लोग नगर निकायों में काम करते नजर आते हैं और उन्होंने एक बीएड डिग्रीधारी व्यक्ति को भी ठेके पर सीमित वेतन में सफाई कर्मचारी के रूप में काम करते देखा।

 

उनका सवाल था कि जब बड़ी संख्या में कॉलेज और शिक्षण संस्थान खोले जा रहे हैं, तब वहां से निकलने वाले युवाओं के रोजगार की योजना कहां है।

 

उन्होंने कहा कि युवाओं के लिए सरकारी नौकरी इसलिए आकर्षक बनी हुई है क्योंकि उसमें रोजगार की सुरक्षा अधिक होती है। ऐसे में शिक्षा और रोजगार की योजना को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

 

शिक्षा और रोजगार के बीच तालमेल जरूरी

 

जोशी ने अपने छात्र जीवन का उदाहरण देते हुए बताया कि समय के साथ विद्यार्थियों की पसंद के विषय बदलते रहे। पहले विज्ञान के कुछ पारंपरिक विषयों में अधिक रुचि थी, बाद में इलेक्ट्रॉनिक्स और फिर इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों की ओर युवाओं का रुझान बढ़ा।

 

उनके अनुसार इसका अर्थ यही है कि युवा भविष्य में मिलने वाले अवसरों को देखकर अपने विषय और करियर का चुनाव करते हैं। इसलिए सरकार को पहले से यह समझना होगा कि आने वाले वर्षों में देश को किस प्रकार के मानव संसाधन की आवश्यकता होगी।

 

उन्होंने कहा कि यदि पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार नहीं मिलेगा तो युवा स्वाभाविक रूप से उस क्षेत्र की ओर जाएंगे, जहां उन्हें भविष्य दिखाई देगा।

 

भ्रष्टाचार का असर छात्रों पर भी पड़ता है

 

पेपर लीक और नकल जैसी घटनाओं को लेकर जोशी ने समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर भी ध्यान दिलाया। उनका तर्क था कि जब किसी युवा को लगातार यह दिखाई देता है कि व्यवस्था में पैसे और प्रभाव से काम कराया जा सकता है, तो उसके मन में भी व्यवस्था के प्रति विश्वास कमजोर होता है।

 

उनके मुताबिक, यदि किसी को यह लगता है कि नौकरी, ठेका या कोई दूसरा अवसर अनुचित तरीके से हासिल किया जा रहा है, तो वह भी गलत रास्ते को स्वीकार करने लगता है।

 

जोशी ने कहा कि जब शासन और संस्थानों पर ही भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, तब युवाओं से केवल ईमानदारी की अपेक्षा करना पर्याप्त नहीं है। व्यवस्था को स्वयं ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करना होगा जिससे नई पीढ़ी सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित हो।

 

उन्होंने अपने कार्यकाल की तुलना करते हुए सवाल उठाया कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के समय पेपर लीक जैसी घटनाएं इतनी बड़ी समस्या क्यों नहीं बनीं।

 

जोशी ने कहा कि जब बैंकिंग, कारोबार और सरकारी व्यवस्था में घोटालों की खबरें सामने आती हैं तो शिक्षा क्षेत्र भी उससे पूरी तरह अलग नहीं रह सकता। उनका कहना था कि ऐसी परिस्थितियों में केवल छात्र को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।

 

परीक्षा को युद्ध जैसा बनाने पर तंज

 

पेपर लीक रोकने के लिए परीक्षा व्यवस्था को अत्यधिक केंद्रीकृत और सुरक्षा-प्रधान बनाए जाने पर भी जोशी ने टिप्पणी की।

 

उन्होंने कहा कि परीक्षा के प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर उनकी छपाई, परिवहन और सुरक्षा तक इतनी जटिल व्यवस्था खड़ी की जा रही है कि पूरी प्रक्रिया किसी बड़े अभियान जैसी लगने लगी है।

 

इसी संदर्भ में उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि परीक्षा आयोजित करनी है या युद्ध लड़ना है।

 

उनके अनुसार मूल समस्या को समझे बिना केवल सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने से पेपर लीक की समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।

 

शिक्षा बजट पर उठाया सवाल

 

शिक्षा के लिए बजट आवंटन को लेकर भी जोशी ने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए, जबकि बुनियादी ढांचे के दूसरे क्षेत्रों पर खर्च लगातार बढ़ रहा है।

 

उन्होंने स्पष्ट किया कि सड़कें और परिवहन व्यवस्था भी देश के विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन हर क्षेत्र में खर्च करने से पहले यह तय करना होगा कि राष्ट्रीय प्राथमिकताएं क्या हैं।

 

उनका कहना था कि यदि देश का लक्ष्य केवल औद्योगिक विस्तार या निजी क्षेत्र के विकास तक सीमित है तो नीतियां उसी दिशा में जाएंगी। लेकिन यदि लक्ष्य समग्र विकास है तो शिक्षा को केंद्र में रखना होगा।

 

जोशी ने उदाहरण देते हुए कहा कि केवल सड़क बना देना पर्याप्त नहीं है। उस सड़क की योजना बनाने, निर्माण करने और मशीनरी संचालित करने के लिए प्रशिक्षित इंजीनियर और कुशल कर्मचारी भी चाहिए। इसलिए बुनियादी ढांचे के विकास के साथ शिक्षा और कौशल विकास पर निवेश आवश्यक है।

 

नई शिक्षा नीति पर जोशी की अलग राय

 

मुरली मनोहर जोशी ने नई शिक्षा नीति को लेकर अपने पुराने अनुभव भी साझा किए। उन्होंने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी शिक्षा नीति में बदलाव को लेकर चर्चा हुई थी।

 

उनके अनुसार उस समय उन्होंने तत्कालीन शिक्षा नीति का अध्ययन किया था और उन्हें लगा था कि पूरी नीति को बदलने के बजाय उसमें आवश्यक सुधार किए जा सकते हैं।

 

जोशी ने कहा कि किसी नीति को केवल इसलिए बदलना उचित नहीं है क्योंकि वह किसी पूर्व सरकार के समय तैयार हुई थी। यदि पुरानी नीति में उपयोगी प्रावधान मौजूद हैं तो उन्हें बनाए रखते हुए जरूरी परिवर्तन किए जा सकते हैं।

 

उन्होंने शिक्षा नीति के उद्देश्य को सबसे महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि नीति को किसी एक औद्योगिक, व्यापारिक या अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य के आधार पर नहीं बनाया जाना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य व्यापक होना चाहिए, जिसमें आर्थिक विकास के साथ व्यक्ति और समाज का विकास भी शामिल हो।

 

नीति निर्माण की प्रक्रिया पर भी सवाल

 

जोशी ने नई शिक्षा नीति तैयार करने वाली समिति को लेकर भी अपने विचार रखे। उन्होंने समिति के अध्यक्ष रहे वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन से अपने पुराने संबंधों का उल्लेख किया।

 

उनके अनुसार शिक्षा नीति तैयार करने के दौरान विभिन्न संस्थाओं और नीतिगत निकायों से आने वाले सुझावों को एक साथ जोड़ा गया। उन्होंने अपने समय के योजना आयोग का उदाहरण देते हुए कहा कि उस दौर में शिक्षा के क्षेत्र में उसकी भूमिका सीमित और आवश्यकता आधारित थी।

 

उनका कहना था कि शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य की जरूरतों के अनुसार कितने और किस प्रकार के प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता होगी, इस पर ध्यान देना जरूरी है।

 

शिक्षा को व्यापार का साधन नहीं मानना चाहिए

 

जोशी ने शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण पर भी चिंता जताई। उन्होंने समान और सुलभ शिक्षा व्यवस्था की वकालत करते हुए कहा कि आर्थिक स्थिति के आधार पर बच्चों की शिक्षा अलग-अलग नहीं होनी चाहिए।

 

उनके विचार में कम से कम माध्यमिक स्तर तक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जहां बच्चे अपने आसपास के विद्यालयों में समान अवसर के साथ पढ़ सकें। उनका मानना है कि अमीर और गरीब परिवारों के बच्चों के बीच शिक्षा के स्तर में बहुत अधिक अंतर सामाजिक असमानता को बढ़ाता है।

 

उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल धन कमाना नहीं होना चाहिए। निजी संस्थानों को शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का अधिकार है, लेकिन शिक्षा से होने वाले आर्थिक लाभ का एक हिस्सा वापस शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में लगाया जाना चाहिए।

 

जोशी ने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों को केवल मुनाफे का माध्यम बनाने की सोच पर आपत्ति जताई। उनके अनुसार ज्ञान और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरी तरह बाजार की शक्तियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

 

विकसित भारत’ पर पूछा- विकास की परिभाषा क्या है?

 

‘विकसित भारत’ के लक्ष्य पर भी जोशी ने एक बुनियादी सवाल उठाया। उनका कहना था कि देश को विकसित बनाने का लक्ष्य निश्चित रूप से रखा जा सकता है, लेकिन पहले यह तय होना चाहिए कि विकास को मापने का आधार क्या होगा।

 

उन्होंने कहा कि आधुनिक आर्थिक मानकों पर किसी समुदाय को पिछड़ा माना जा सकता है, लेकिन यदि वही समुदाय प्रकृति की रक्षा करता है, पर्यावरण के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीता है और सामाजिक मूल्यों को महत्व देता है तो उसे केवल आर्थिक पैमाने पर कमतर कैसे माना जा सकता है।

 

उनके मुताबिक शिक्षा नीति में आर्थिक उपलब्धियों के साथ मानवीय मूल्यों को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

 

उन्होंने कहा कि यदि समाज से एक ओर नैतिक और मानवीय मूल्यों की अपेक्षा की जाती है और दूसरी ओर आर्थिक सफलता के लिए अलग-अलग मानक तय किए जाते हैं, तो दोनों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

 

महंगी उच्च शिक्षा पर चिंता

 

उच्च शिक्षा की बढ़ती लागत को लेकर भी जोशी ने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि देश में ज्ञान और परंपरा की बात तो की जाती है, लेकिन दूसरी ओर ऐसे संस्थान भी सामने आ रहे हैं जहां पढ़ाई का खर्च सामान्य परिवारों की क्षमता से बाहर है।

 

उनका कहना था कि यदि किसी अच्छे संस्थान में प्रवेश पाने के लिए बहुत बड़ी रकम की आवश्यकता हो तो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं।

 

जोशी के मुताबिक महंगी शिक्षा आर्थिक असमानता को और गहरा कर सकती है। उन्होंने सवाल उठाया कि देश के बड़े और प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों पर इतना मानसिक और सामाजिक दबाव क्यों बढ़ रहा है कि वहां आत्महत्या जैसी गंभीर घटनाएं सामने आती हैं।

 

उनके अनुसार शिक्षा व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा के साथ आर्थिक और सामाजिक असमानता भी विद्यार्थियों के तनाव को बढ़ाने वाली वजह बन सकती है।

 

सरकारी स्कूल बंद करने के तर्क पर सवाल

 

सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या कम होने के आधार पर स्कूलों को बंद या मर्ज करने की नीति पर भी जोशी ने सवाल किया।

 

उनका कहना था कि पहले यह पता लगाना चाहिए कि स्कूलों में बच्चे कम क्यों हो रहे हैं। यदि विद्यार्थियों को विद्यालय में शिक्षक नहीं मिलेंगे या आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी, तो अभिभावक और बच्चे स्वाभाविक रूप से दूसरे विकल्प तलाशेंगे।

 

उन्होंने कहा कि केवल कम नामांकन को स्कूल बंद करने का आधार बनाने के बजाय सरकार को यह देखना चाहिए कि वहां शिक्षक नियमित क्यों नहीं पहुंचते और विद्यालय की व्यवस्था में कमी कहां है।

 

शिक्षक और बुनियादी सुविधाओं की कमी

 

जोशी ने सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों और बुनियादी सुविधाओं की कमी को गंभीर समस्या बताया। उन्होंने कहा कि विद्यालय खोलना अपने आप में पर्याप्त नहीं है।

 

यदि किसी स्कूल में विषयवार शिक्षक नहीं हैं, भवन अधूरा है या छत जैसी बुनियादी सुविधा तक उपलब्ध नहीं है तो वहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के भविष्य पर सीधा असर पड़ेगा।

 

उन्होंने विद्यार्थियों की ओर से सामने आने वाली ऐसी शिकायतों का उल्लेख करते हुए कहा कि कहीं बच्चे शिक्षक की कमी की बात करते हैं तो कहीं विद्यालय भवन की समस्या सामने आती है।

 

उनका स्पष्ट संदेश था कि शिक्षा व्यवस्था को केवल आंकड़ों और नए संस्थानों की संख्या से नहीं, बल्कि वहां उपलब्ध वास्तविक सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता से मापा जाना चाहिए।

 

मुरली मनोहर जोशी के इस इंटरव्यू में उठाए गए सवालों से साफ है कि वह शिक्षा को केवल रोजगार या आर्थिक विकास का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और व्यक्ति के समग्र विकास की आधारशिला के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार शिक्षा नीति की सफलता इस बात से तय होगी कि वह देश के अंतिम व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समान अवसर और बेहतर भविष्य की संभावना कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचा पाती है।

What's your reaction?

Related Posts

Epaper