मप्र हाईकोर्ट में जनप्रतिनिधियों के मुकदमे वापसी पर मंथन, 15 आपराधिक मामले अब भी लंबित
सांसद-विधायकों के साथ सह-आरोपियों को भी मिलेगा मुकदमा वापसी का लाभ? 4 नवंबर को होगी अगली सुनवाई

जबलपुर। मध्यप्रदेश में सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को लेकर हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस दौरान मुकदमा वापस लेने की कानूनी प्रक्रिया और उसके दायरे को लेकर कई अहम सवाल उठे। हाईकोर्ट की युगलपीठ अब इस बात पर विचार करेगी कि किसी मामले में सांसद या विधायक के साथ अन्य लोग भी आरोपी हैं तो सरकार की ओर से अभियोजन वापस लेने पर इसका लाभ केवल जनप्रतिनिधि को मिलेगा या सभी सह-आरोपियों को भी दिया जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर निर्धारित की है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ब्रह्मदत्त सिंह ने पिछली स्टेटस रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि प्रदेश में सांसदों और विधायकों से संबंधित कुल 19 आपराधिक मामले लंबित थे। इनमें से तीन मामलों का निराकरण विशेष अदालतों द्वारा किया जा चुका है, जबकि एक मामला हाईकोर्ट से निरस्त हो गया है। इस प्रकार अब 15 मामले लंबित हैं।
मुकदमा वापसी में किस अदालत की अनुमति जरूरी?
सुनवाई के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत अभियोजन वापस लेने के अधिकार और प्रक्रिया पर भी चर्चा हुई। सवाल यह उठा कि सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों में अभियोजन वापस लेने के लिए विशेष अदालत की सहमति पर्याप्त होगी या इसके लिए हाईकोर्ट की अनुमति भी आवश्यक होगी। युगलपीठ इन कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी और संबंधित अदालतों के अधिकार क्षेत्र की स्थिति स्पष्ट कर सकती है।
पांच आरोपी होने पर सभी को मिलेगा फायदा?
मामले में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के जरिए कानूनी सवाल उठाया गया। यदि किसी आपराधिक प्रकरण में पांच आरोपी हैं और उनमें से एक सांसद या विधायक है, तो सरकार उसके खिलाफ अभियोजन वापस लेने की मांग करती है। ऐसी स्थिति में क्या मुकदमा वापसी का लाभ केवल जनप्रतिनिधि को मिलेगा या बाकी चार सह-आरोपियों को भी इसका फायदा मिल सकता है?
हस्तक्षेपकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष दत्त ने दलील दी कि मुकदमा वापसी का लाभ सभी पांच आरोपियों को मिल सकता है। हालांकि, इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय संबंधित मामले के तथ्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर होगा।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हो रही निगरानी
यह मामला अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर देशभर के हाईकोर्ट में सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की निगरानी की जा रही है। इसी क्रम में 22 सितंबर 2020 को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में भी जनहित याचिका दर्ज की गई थी।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता संजय के. अग्रवाल तथा अधिवक्ता अहादुल्ला उस्मानी और रविशंकर पटेल ने भी पक्ष रखा। अब 4 नवंबर को होने वाली सुनवाई में राज्य सरकार को लंबित मामलों की अद्यतन स्थिति प्रस्तुत करनी है।















































