
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा है कि मामूली और निराधार आधारों पर आपराधिक मामले दर्ज किए जाने से भारतीय न्याय व्यवस्था उदार लोकतांत्रिक दुनिया के सामने मज़ाक का विषय बन रही है.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि खाना खाने, कविता पढ़ने और प्रदर्शन में शामिल होने जैसी बातों को लेकर भी आपराधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं. इसके अलावा नारे लगाने, सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने, स्टैंड-अप कॉमेडी करने और किताबों व फिल्मों के शीर्षक या उनकी सामग्री को लेकर भी लोगों पर मुक़दमे दर्ज किए जा रहे हैं.
उल्लेखनीय है कि जस्टिस भुइयां ने ये बातें 17 सितंबर को नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सेंटर फॉर डिस्कोर्सेज ऑन क्रिमिनल एंड कॉन्स्टिट्यूशनल ज्यूरिस्प्रुडेंस द्वारा आयोजित चौथे डिस्कोर्स में कहीं. वह ‘आपराधिक मुक़दमों में नैतिकता और बचाव पक्ष तथा अभियोजन पक्ष के कर्तव्य’ विषय पर बोल रहे थे.
उन्होंने कहा, ‘आरोप हास्यास्पद हैं और अक्सर किसी की समझ का अपमान करने की हद तक पहुंच जाते हैं. इसके बावजूद ऐसे आपराधिक मामले लगातार दर्ज किए जा रहे हैं. इतना ही नहीं, कुछ मामलों में आरोपपत्र भी दाखिल किए जाते हैं, जिसके बाद मुक़दमा चलता है.’
जस्टिस भुइयां ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को ऐसे मामलों को हटाने के लिए विशेष अभियान चलाना चाहिए.
देश की अदालतों में 4.27 करोड़ आपराधिक मामले लंबित
जस्टिस भुइयां ने नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 17 सितंबर तक देश की सभी अदालतों में 4.27 करोड़ आपराधिक मामले लंबित थे.
इनमें से 4.07 करोड़ यानी 95.31% मामले ट्रायल कोर्ट में लंबित थे. वहीं, 19.84 लाख यानी 4.64% मामले हाईकोर्ट और 22,143 मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित थे.
उन्होंने कहा कि जब अदालतों में पहले से ही इतने मामले लंबित हैं और न्याय व्यवस्था उन्हें संभालने में मुश्किल का सामना कर रही है, तब ऐसे निराधार मामलों का अतिरिक्त बोझ ट्रायल कोर्ट के लिए स्थिति को और कठिन बना रहा है.
उन्होंने कहा, ‘ये मामले व्यवस्था को और अधिक मुश्किल बना रहे हैं. इनमें नतीजे लगभग पहले से तय होते हैं और इससे हमारी न्याय व्यवस्था उदार लोकतांत्रिक दुनिया के सामने मज़ाक का विषय बन रही है. जितनी जल्दी हम इस समस्या से निपटेंगे, उतना ही हम सबके लिए बेहतर होगा.’
‘वकीलों को नतीजे से ऊपर प्रक्रिया को रखना चाहिए’
जस्टिस भुइयां ने यह भी कहा कि वकीलों को मुक़दमे के नतीजे को प्रक्रिया से ऊपर नहीं रखना चाहिए.
उन्होंने आगे कहा, ‘सज़ा दिलाने के लिए सबूत छिपाने वाला अभियोजक और बरी कराने के लिए गवाह के साथ छेड़छाड़ करने वाला बचाव पक्ष का वकील एक ही ग़लती करते हैं: वे मुक़दमे के नतीजे को प्रक्रिया से ऊपर रखते हैं.’












































