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दोषी को फांसी से ही दी जाएगी सजा-ए-मौत, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की ‘कम दर्दनाक’ विकल्प वाली याचिका

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसले में उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें फांसी के ज़रिए दी जाने वाली मौत की सजा की जगह कम दर्दनाक तरीकों को अपनाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि दोषी को ऐसी सजा दी जाए जिससे उसकी मृत्यु जल्दी हो और उसे कम पीड़ा सहनी पड़े। लेकिन अदालत ने साफ कर दिया कि भारत में फिलहाल मौत की सजा का तरीका फांसी ही रहेगा और इसका संवैधानिक आधार पूरी तरह से सही है।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस याचिका को सुनते हुए कहा कि मौजूदा व्यवस्था को बदलने का कोई ठोस कारण नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले दिए गए तीन फैसलों को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग भी अस्वीकार की जाती है। यानी, इस विषय पर पहले के निर्णय ही लागू रहेंगे और फांसी को ही मौत की सजा का मान्य तरीका माना जाएगा।

याचिका में क्या कहा गया था?

वकील ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर याचिका में यह दलील दी गई थी कि फांसी एक लंबी और पीड़ादायक प्रक्रिया है। इसके बजाय अन्य विकल्प जैसे कि:

  • जहरीला इंजेक्शन – जिससे कुछ ही मिनटों में मृत्यु हो सकती है।
  • गोली मारना – जो तेज़ और सीधा तरीका है।
  • बिजली का झटका – जिसे कई देशों में अपनाया गया है।
  • गैस चैंबर – जिससे दोषी की मृत्यु कुछ ही मिनटों में हो जाती है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि इन तरीकों से दोषी की गरिमा बनी रहती है और उसे कम दर्द झेलना पड़ता है।

संवैधानिक आधार

सुप्रीम कोर्ट ने यह दोहराया कि भारतीय संविधान में फांसी को मौत की सजा देने का वैध तरीका माना गया है। अदालत ने यह भी कहा कि इस विषय पर पहले से ही कई बार विचार किया जा चुका है और मौजूदा व्यवस्था को बदलने का कोई औचित्य नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य

दुनिया के कई देशों में मौत की सजा के अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए:

  • अमेरिका में लीथल इंजेक्शन सबसे आम तरीका है।
  • कुछ देशों में फायरिंग स्क्वाड का इस्तेमाल होता है।
  • जापान और भारत जैसे देशों में अब भी फांसी को ही मान्यता प्राप्त है।

इस तुलना से स्पष्ट होता है कि भारत ने अपनी परंपरा और संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर फांसी को ही बनाए रखा है।

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