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लॉ एंड ऑर्डर सुधारना क्या अपराध है, आंदोलन के दबाव में पुलिस अधिकारी को हटाना कितना उचित

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मामला यातायात और जाम हटाने से शुरू हुआ, विवाद बढ़ने के बाद थाना प्रभारी अतर सिंह पर कार्रवाई से उठे सवाल

 

विंध्यभूमि/मड़वास/सीधी। मड़वास में थाना प्रभारी अतर सिंह को लेकर शुरू हुआ विवाद अब पुलिस कार्रवाई से आगे बढ़कर कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर चर्चा का विषय बन गया है। बताया जा रहा है कि प्रारंभिक विवाद बाजार में यातायात व्यवस्था और भीड़ के कारण लग रहे जाम को हटाने को लेकर हुआ था। ऐसे में पूरे घटनाक्रम को लेकर यह सवाल सामने आया है कि यदि पुलिस अधिकारी का मूल प्रयास बाजार में यातायात व्यवस्था सुचारु करने और जाम की स्थिति नियंत्रित करने का था, तो बाद में विवाद को इतना बड़ा रूप देकर पुलिस अधिकारी पर कार्रवाई का दबाव बनाना कितना उचित है।

 

आरोपों की पुष्टि से पहले कार्रवाई का संदेश क्या जाएगा

घटना के बाद थाना प्रभारी पर गाली-गलौज सहित कई आरोप लगाए गए, लेकिन इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। यदि किसी आरोप के समर्थन में ठोस प्रमाण सामने नहीं आए हैं, तो केवल शिकायत या आंदोलन के दबाव में पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई किए जाने से भविष्य में एक अलग तरह की मिसाल कायम होने की आशंका जताई जा रही है।

 

यदि किसी व्यक्ति, संगठन या संघ को किसी पुलिस अधिकारी के व्यवहार से आपत्ति होती है तो शिकायत और जांच का रास्ता खुला है। लेकिन यदि हर विवाद के बाद आरोप लगाकर आंदोलन किया जाए और आंदोलन के दबाव में पुलिस अधिकारी को हटाने की मांग स्वीकार होने लगे, तो इससे कानून-व्यवस्था संभालने वाले अधिकारियों के सामने भी असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है।

सख्त मिजाज अधिकारी, लेकिन कानून-व्यवस्था पर सख्ती जरूरी

थाना प्रभारी अतर सिंह के बारे में यह जानकारी सामने आई है कि वे आर्मी से सेवानिवृत्त हैं। सैन्य पृष्ठभूमि के कारण अनुशासन, व्यवस्था और कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देना उनके कार्यशैली का हिस्सा माना जाता है। ऐसे में उनका सख्त मिजाज होना स्वाभाविक माना जा सकता है।

 

 

पुलिस की जिम्मेदारी केवल शिकायत दर्ज करना ही नहीं, बल्कि बाजारों में यातायात व्यवस्था बनाए रखना, भीड़ और जाम को नियंत्रित करना तथा कानून-व्यवस्था कायम रखना भी है। इसके लिए कई बार पुलिस अधिकारियों को सख्ती से हस्तक्षेप करना पड़ता है। सख्ती और दुर्व्यवहार में अंतर है और यह अंतर जांच में सामने आना चाहिए।

 

व्यापारी संघ के आंदोलन से पुलिस प्रशासन पर दबाव

 

मड़वास में व्यापारियों के विरोध और थाना घेराव के बाद पुलिस प्रशासन ने थाना प्रभारी अतर सिंह को लाइन हाजिर कर दिया। इसके बाद इस कार्रवाई को लेकर स्थानीय स्तर पर बहस शुरू हो गई है।एक पक्ष जहां व्यापारियों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है, वहीं दूसरा पक्ष यह सवाल उठा रहा है कि क्या किसी पुलिस अधिकारी को केवल विरोध-प्रदर्शन के दबाव में हटाया जाना उचित प्रक्रिया है।

यदि थाना प्रभारी के खिलाफ शिकायतें हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि जांच में आरोप निराधार पाए जाते हैं, तो फिर अधिकारी की कार्यशैली और कार्रवाई को भी उसी नजर से देखा जाना चाहिए।

 

 

आज एक थाना प्रभारी, कल हर सख्त अधिकारी के सामने यही रास्ता

 

मड़वास की घटना ने पुलिसिंग को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस जरूर खड़ी कर दी है। यदि यातायात व्यवस्था सुधारने, बाजार से जाम हटाने या कानून-व्यवस्था कायम रखने के दौरान किसी अधिकारी से विवाद होता है और उसके बाद सामूहिक दबाव बनाकर अधिकारी को हटाने की मांग सफल हो जाती है, तो भविष्य में कोई भी संगठन इसी तरीके को अपनी मांग मनवाने का माध्यम बना सकता है।

कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाने वाले पुलिस अधिकारी को भी जवाबदेह होना चाहिए, लेकिन उसके खिलाफ कार्रवाई शिकायतों और प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए, केवल भीड़ या आंदोलन के दबाव में नहीं।

 

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक सवाल व्यापारिक संगठनों की भूमिका को लेकर भी उठता है। क्या हर व्यापारी हमेशा नियमों के मुताबिक ही अपना कारोबार संचालित करता है? क्या व्यापारिक प्रतिष्ठानों में कभी नियमों का उल्लंघन नहीं होता, या जीएसटी से जुड़े नियमों के उल्लंघन, बिलिंग में अनियमितता, अतिक्रमण, अवैध पार्किंग अथवा अन्य कारोबारी नियमों को लेकर कभी शिकायतें सामने नहीं आतीं? इसका मतलब यह नहीं कि किसी व्यापारी को गलत ठहराया जाए, बल्कि सवाल यह है कि जब हर वर्ग के लिए कानून और नियम समान हैं, तो पुलिस द्वारा यातायात व्यवस्था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई का विरोध करने के बजाय पहले पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच क्यों न हो? यदि पुलिस अधिकारी की गलती साबित होती है तो कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यदि गलती साबित नहीं होती तो केवल सामूहिक दबाव के आधार पर किसी अधिकारी को हटाना भी उचित नहीं माना जा सकता।

यही कारण है कि मड़वास प्रकरण में असली सवाल केवल एक थाना प्रभारी के लाइन हाजिर होने का नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या भविष्य में कोई भी संगठन अपनी मांग मनवाने के लिए आंदोलन और दबाव का रास्ता अपनाकर प्रशासनिक फैसले प्रभावित कर सकेगा?

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